जिस तरह से श्रावण मास में भगवान शिव की भक्ति होती है, उसी तरह से भाद्रपद मास में श्रीकृष्ण की आराधना का महत्व है। कृष्ण जन्माष्टमी पर भक्त गण पूरा दिन उपवास करते हैं। रात के 12 बजे तक भगवान श्री कृष्ण जी का जागरण, भजन, पूजन-अर्चना करते हैं। इस साल भगवान श्रीकृष्ण का 5247वां जन्मोत्सव मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, भाद्रमास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त रविवार को होगा। अष्टमी तिथि 30 अगस्त सोमवार तक रहेगी। इस हिसाब से व्रत के लिए उदया तिथि को मानते हुए 30 अगस्त को जन्माष्टमी होगी।

8 साल बाद श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर बन रहे ये शुभ योग :

श्रीमद्भागवत भविष्य पुराण के अनुसार, श्रीकृष्ण का जन्म भाद्र कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि बुधवार रोहिणी नक्षत्र एवं वृषभ राशि के चंद्रमा कालीन अर्धरात्रि के समय हुआ था। कई बार वृषभ राशि में चंद्रमा तो होता है परंतु राहिणी नक्षत्र नहीं होता इसलिए असमंजस की स्थिति बन जाती है, परंतु इस वर्ष 2021 में ठीक 8 साल बाद यह दुर्लभ संयोग बन रहा है जब रोहिणी नक्षत्र भी होगा और राशि भी बृष होगी। हां! बुधवार की बजाय सोमवार पड़ेगा। गौतमी तंत्र नामक ग्रन्थ तथा पदमपुराण के अनुसार, यदि कृष्णाष्टमी सोमवार या बुधवार को पड़े तो यह दिवस जयंती के नाम से विख्यात होता है और अत्यंत शुभ एवं शुभ माना जाता है।

श्री कृष्णा जन्माष्टमी पूजा शुभ मुहूर्त :

इस साल श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व 30 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार,भाद्रमास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 29 अगस्त को रविवार को रात 11 बजकर 25 मिनट पर होगा। अष्टमी तिथि 30 अगस्त को रात में 1 बजकर 59 मिनट तक रहेगी। इस हिसाब से व्रत के लिए उदया तिथि को मानते हुए 30 अगस्त को जन्माष्टमी होगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त 30 अगस्त की रात को 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। भादो माह में ही भगवान श्रीकृष्ण ने रोहिणी नक्षत्र के वृष लग्न में जन्म लिया था। 30 अगस्त को रोहणी नक्षत्र व हर्षण योग रहेगा। जन्माष्टमी के दिन अष्टमी और रोहिणी नक्षत्र एक साथ पड़ रहे हैं, इसे जयंती योग मानते हैं और इसलिए ये संयोग और बेहतर है। द्वापरयुग में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, तब भी जयंती योग पड़ा था। इसलिए इस योग मानते है।

व्रत कब और कैसे रखा जाए?

सुबह स्नान के बाद ,व्रतानुष्ठान करके ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप करें। पूरे दिन व्रत रखें। फलाहार कर सकते हैं। रात्रि के समय ठीक बारह बजे, लगभग अभिजित मुहूर्त में भगवान की आरती करें। प्रतीक स्वरुप खीरा फोड़ कर, शंख ध्वनि से जन्मोत्सव मनाएं। चंद्रमा को अर्घ्य देकर नमस्कार करें। तत्पश्चात मक्खन, मिश्री, धनिया, केले, मिष्ठान आदि का  प्रसाद ग्रहण करें और बांटें। अगले दिन नवमी पर नन्दोत्सव मनाएं। भगवान कृष्ण की आराधना के लिए आप यह मंत्र पढ़ सकते हैं।

ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिशां पते!
नमस्ते रोहिणी कान्त अर्घ्य मे प्रतिगृह्यताम्!!