आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी तिथि के रूप में मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु 4 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं। जिस कारण सभी शुभ कार्य कुछ समय के लिए वर्जित हो जाते हैं। 4 महीने बाद जब भगवान् विष्णु योग निद्रा से जागते हैं, तब फिर से शुभ कार्य प्रारंभ होते हैं। भगवान् विष्णु जब योग निंद्रा से जागते है तब उनका विवाह तुलसी से कराया जाता है। ऐसा कहते हैं कि जो लोग तुलसी विवाह संपन्न कराते हैं, उनकी शादी के योग बनते हैं। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत प्रिय हैं।

पुराणों में तुलसी के पौधे का महत्व :

पुराणों में तुलसी को पूज्य और शुभता का प्रतीक माना गया है। पूजा-पाठ में भी तुलसी के पत्ते का इस्तेमाल शुभ माना जाता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है। यही नहीं भगवान विष्णु की पूजा, तुलसी पत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। बिना तुलसी के श्री हरि को भोग नहीं लगता।

शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है की जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। दरिद्रता, अशांति और क्लेश के बीच लक्ष्मी जी का निवास नहीं हो, ज्योतिष में इसकी वजह बुध माना जाता है।

क्यों दिया था तुलसी ने भगवान् विष्णु को श्राप ?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसी पूर्व जन्म मे एक लड़की थी, जिसका नाम वृंदा था। राक्षस कुल में जन्मी यह बच्ची बचपन से ही भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी। जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में ही दानव राज जलंधर से संपन्न हुआ। राक्षस जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। कहा जाता है जलंधर के पास अद्भुत शक्तियां थी। उसकी इस शक्ति का कारण उसकी पत्नी वृंदा थी। उधर जालंधर युद्ध कर रहा था और इधर वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गई। वृंदा के पतिव्रता धर्म के कारण सभी देवी-देवता मिलकर भी जलंधर को पराजित नहीं कर पा रहे थे।

इसके बाद सभी देवों ने मिलकर भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने जलंधर का भेष धारण किया और वृंदा के महल में पहुंच गए। वृंदा भगवान विष्णु को अपना पति समझकर उनके साथ पत्नी जैसा व्यवहार करने लगी।। इधर, वृंदा का संकल्प टूटा, उधर युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया।

जलंधर का कटा हुआ सिर जैसे ही महल में गिरा तो भगवान् विष्णु का भेद वृंदा के सामने खुल गया। वृंदा ने कुपित होकर भगवान को श्राप दे दिया कि वे पत्थर के हो जाएं। इसके चलते भगवान तुरंत पत्थर के हो गए, भगवान् विष्णु के इस पत्थर स्वरुप को ही शालिग्राम कहते हैं। इसके बाद वृंदा अपने पति के साथ सती हुई, जिस जगह वह सती हुई वहां तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। भगवान विष्णु अपने छल पर बड़े लज्जित हुए और बोले, “किसी भी शुभ कार्य में बिना तुलसी जी के भोग के पहले कुछ भी स्वीकार नहीं करुंगा।” तभी से ही तुलसी जी कि पूजा होने लगी। कार्तिक मास में तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ किया जाता है। साथ ही देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।