kartik maas

कार्तिक माह में तारा भोजन करने का विधान होता है। पूरे दिन भर व्रती निराहार रहकर रात्रि में तारों को अर्ध्य देकर भोजन करते हैं, इसलिए इसे तारा भोजन के नाम से जाना जाता है। कार्तिक मास के अंतिम दिन व्रत का उद्यापन भी किया जाता है। कार्तिक माह में पूरे मास अपनी इच्छा और शक्ति के अनुसार व्रत का विधान होता है। पूरे मास व्रत के अलग-अलग विधान बताए गए हैं। जो भी मनुष्य को उत्तम लगता है और पूरे माह पालन करने के योग्य लगता है, वह उस नियम के अनुसार ही व्रत रखता है। व्रत के उद्यापन में अपनी श्रद्धानुसार ब्राह्मण को दक्षिणा देने के साथ ही किसी ब्राह्मणी, सास अथवा किसी बुजुर्ग महिला को साड़ी और सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देने का विधान होता है। तो आइए जानें, कार्तिक मास तारा भोजन और पूरे मास में किस तरह के व्रत होते हैं।

कार्तिक मास के संबंध में पुराणों में उल्लेख है जिसमें ब्रह्माजी बताते हैं कि कार्तिक मास के समान कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेदों के समान कोई शास्त्र नहीं और गंगाजी के समान दूसरा कोई तीर्थ नहीं है। साथ ही अन्न दान के बराबर कोई दान नहीं होता।

कार्तिक मास में भगवान राधा-कृष्णा ,पीपल , पथवारी , तुलसी, आंवले ,केले कि पूजा करनी चाहिए। साथ ही रोज पांच पत्थर रखकर पथवारी पूजा, कीर्तन और दीपदान करना चाहिए। साथ ही रोज कार्तिक माहात्म्य सुनना चाहिए।

आज हम आपको कार्तिक माह से जुड़ी एक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे शायद ही पहले कभी किसी ने सुनी होगी।

तारा भोजन व्रत कथा 

किसी नगर में साहूकार था और उसकी एक बहू तारा भोजन करती थी। एक दिन उसने अपनी सास को कहानी सुनाने को कहा तो सास मना कर दिया और कहा कि मुझे अभी अपनी पूजा करनी है। उसने फिर अपनी जेठानी से कहा कि आप मेरी कहानी सुन लो ? उसने भी मना करते हुए कहा कि मुझे तो अभी खाना बनाना है। इसी तरह से उसने अपनी देवरानी को कहा , फिर ननद से कहा पर किसी ने उसकी कहानी नहीं सुनी।

वह अपने नगर के राजा के पास गई कि आप मेरी कहानी सुन लो तो राजा ने कहा कि मुझे अपना व्यापर देखना है, कहानी सुनने का समय नहीं है। उसकी यह मनोदशा देखकर भगवान् उसके लिए स्वर्ग से विमान भेजते हैं। स्वर्ग से विमान आया देख उसकी सास, जेठानी, ननद, नगर के राजा सभी उसके साथ जाने को तैयार होते हैं मगर उसने सभी को मना कर दिया। अंत में उसकी पड़ोसन आती है और कहती है कि बहन क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकती हूँ। तब वह कहती है हां ! तुम मेरे साथ चलो क्योंकि एक तुम ही हो जिसने कार्तिक महीने की पुरे माह की कहानी मुझसे सुनी हो। दोनों विमान में बैठकर स्वर्ग जाने लगे। तभी उस बहु के मन में अभिमान आया कि मैंने कार्तिक महीने की पूरी माह व्रत किया और मेरी पड़ोसन ने केवल कहानी सुनी तो मेरे वजह से इसे स्वर्ग में वास मिल रहा है।

बहू के मन में यह विचार आते ही भगवान् ने विमान से उसे निचे फेंक दिया। उसने भगवान् से पूछा कि भगवान् मेरा अपराध तो बता दीजिये कि आपने ऐसा क्यों किया ? भगवान् बोले कि तुझे अभिमान हो गया है इसलिए तू धरती पर रह। अब तू आने वाले तीन वर्ष तक तारा भोजन व्रत करेगी तभी तुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी।