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भगवान की स्तुति करने के बहुत से तरीके होते हैं कोई कीर्तन करके उनका आभार जताता है, तो कोई जागरण, हवन करके भगवान को याद करता है। हम में से अधिकतर लोग तो ऐसे हैं जो रोजाना पूजा-पाठ करते हैं लेकिन क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि पूजा-पाठ के बाद आरती क्यों की जाती है। आरती करने के पीछे भी एक कारण है। आइए जानते हैं आरती करने के पीछे का तर्क –

आरती की महिमा एवं महत्व :

धार्मिक मान्यता है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है, तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं। “स्कन्द पुराण” में आरती के महत्व की चर्चा सबसे पहले की गई है। आरती हिन्दू धर्म की पूजा परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।

किसी भी पूजा, यज्ञ, अनुष्ठान के अंत में की आरती की जाती है। एक थाल में ज्योति और कुछ विशेष वस्तुएं रखकर भगवान के सामने घुमाते हैं। सबसे ज्यादा महत्व होता है आरती के साथ गाई जाने वाली स्तुति का। आरती की थाल को इस प्रकार घुमाना चाहिए कि ॐ की आकृति बन सके। आरती को भगवान के चरणों में चार बार, नाभि में दो बार, मुख पर एक बार और सम्पूर्ण शरीर पर सात बार घुमाना चाहिए।

यह ध्यान रखें कि आरती की थाल में कपूर या घी के दीपक दोनों से ही ज्योति प्रज्ज्वलित की जा सकती है। अगर दीपक से आरती करनी, तो ये पंचमुखी होना चाहिए।

आरती करने के फायदे :

आरती की थाल में रुई, घी, कपूर, फूल, चंदन होता है। रुई शुद्घ कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है। जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारात्मक ऊर्जा भाग जाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है। इस वजह से मन में अच्छे विचारों का आगमन होता है। जिससे किसी भी प्रकार की नकारात्मकता हम पर हावी नहीं होती. साथ ही आरती में बजने वाले शंख और घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है, जिससे मन में चल रहे प्रश्नों पर विराम लगकर हमारे मन को शांति मिलती है।

आरती करने के नियम-
  • बिना पूजा उपासना, मंत्र जाप, प्रार्थना या भजन के सिर्फ आरती नहीं की जा सकती है।
  • हमेशा किसी पूजा या प्रार्थना की समाप्ति पर ही आरती करना श्रेष्ठ होता है।
  • आरती की थाल में कपूर या घी के दीपक दोनों से ही ज्योति प्रज्ज्वलित की जा सकती है।
  • अगर दीपक से आरती करें, तो ये पंचमुखी होना चाहिए।
  • इसके साथ पूजा के फूल और कुमकुम भी जरूर रखें।
  • आरती की थाल को इस प्रकार घुमाएं कि ॐ की आकृति बन सके।
  • आरती को भगवान के चरणों में चार बार, नाभि में दो बार, मुख पर एक बार और सम्पूर्ण शरीर पर सात बार घुमाना चाहिए।